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शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

रोशनी की यह गली बहुत तंग है



रोशनी की यह गली बहुत तंग है ,
हम यहाँ से होकर जो जायेंगे -
अंधेरों में सन जायेंगे !
हमने अपनी तड़प से कई बार पूछा -
कि तू क्यों उन अंधेरी ,गुमनाम गलियों की ,
रोज़ जीती और मरती कथा कहती आ रही है,
क्यों मुझे चैन से जीने नहीं देती,
क्यों सता रही है ,
यह रोशनी,यह रौनक ,यह रंग -
तुझे क्यों नहीं भाता ,
क्यों तुझे भी राजपथ पर चलना नहीं आता,
मगर कोई जवाब नहीं आया -
सिवा इसके कि भीतर
कुछ तड़का, कुछ टूटा ,
कुछ धसक गया !!
कुछ आवाज़ों के शब्द नहीं ,सिर्फ अर्थ होते हैं !!

9 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ आवाज़ों के शब्द नहीं ,सिर्फ अर्थ होते हैं !!रोशनी की यह गली बहुत तंग है ,
    हम यहाँ से होकर जो जायेंगे -
    अंधेरों में सन जायेंगे !

    अच्छी रचना

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  2. कुछ आवाज़ों के शब्द नहीं,सिर्फ अर्थ होते हैं...
    इसी मूलमंत्र के ताने-बाने से बुनी कविता प्रभावशाली रही.

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  3. रचना की एक एक पंक्ति सारगर्भित और मनुष्यता की महान मजबूरी को रखांकित करने वाली हैं
    रचना की अर्थवत्ता अंतिम पंक्ति में स्वमेव प्रकट हो जाती है
    होश में ला देने वाली रचना के लिए ह्रदय से बधाई

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  4. बहुत सुन्दर कविता और चित्र भी ।

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  5. आप सभी मित्रों का सुन्दर टिप्पणियों के लिए
    हार्दिक आभार !

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  6. अति सुन्दर रचना अरुण जी,आपके शब्दों का चयन बहुत आकर्षित करता है आभार!!

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  7. मोहन श्रोत्रिय24 अगस्त 2011 को 12:06 am

    'कुछ तडका, कुछ टूटा, कुछ धसक गया'. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है अलग-से अनुभव की.

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  8. कुछ आवाजों के शब्द नहीं अर्थ होते हैं..... सुंदर रचना बहुत कुछ कहती हुई.....बधाई आपको अरुण सर....आभार

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