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गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

ज़रूरतें


हर दिन ज़रूरतें,  
मेरी गर्दन पर एक जुआ रख देती हैं !

हर दिन मैं एक कोल्हू खींचता हूँ 
और कोल्हू मुझे !

सारा दिन -
ऊब  के साथ एक ही वृत्त में घूमते रहना 
सरसों के साथ मेरा भी तेल निकाल लेता है !

और शाम 
एक खाली बोरी घर वापस लौटती है ,
जिसके मुंह का एक कोना अब भी खुला  है !

है न अजीब !

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

यही जोड़-तोड़






छोटे छोटे धागों के टुकड़े ,
उलझ भी जाएँ तो -
एक एक खींच लो या
जमीन पर पटक दो,
खुल के बिखर जायेंगे !

लम्बे लम्बे धागे यदि
आपस में उलझ जाएँ -
सुलझाना मुश्किल है !

उलझे इस ज़माने की
लम्बी-लम्बी बातें भी
बहुत बहुत उलझी हैं,
जितना भी सुलझाओ
और उलझ जातीं हैं !

थक-हार हम
इस उलझन से झुंझलाकर,
तोड़ तोड़ धागों को
अलग कर डालते हैं ,
और यह समझते हैं-
विश्लेषण कर लिया ,
बात सब समझ ली !

लेकिन इस बीच
यह जाते हैं भूल कि -
कौन- सा टुकड़ा किस धागे से तोड़ा था
कौन- सी बात किस बात का हिस्सा है !

अब नयी उलझन कि -
किन- किन हिस्सों को आपस में जोड़ दें ,
कहीं फिर झुंझलाकर और भी न तोड़ दें ,
या कि इन्हें घबराकर ऊबें और छोड़ दें !

लेकिन हमने धीरज से काम लिया-
कौन जान पायेगा ?
किसी को किसी में जैसे-तैसे जोड़ दिया,
रील एक बना ली ,
अब मैं बुद्धिमान, प्रतिभा का धनीहूँ,
ए! ज़रा सुनों तनिक,
दुनियाँ को समझोगे ?
देखो, मैं दार्शनिक !

मेरे जैसे जाने कितने
और भी हैं रील वाले,
रोशन चराग हैं रुपहली कंदील वाले ,
उनके अपने फंडे हैं ,
उनके अपने झण्डे हैं ,
विरोधियों के वास्ते-
छुपे आस्तीनों में
मूठ लगे डंडे हैं ,
आपस में जिनके
लगी बड़ी होड़ है ,
और मैं ये सोंचता हूँ ,
ज़िंदगी !!
क्या तेरा नाम बस
है यही जोड़-तोड़
 ?

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

रोशनी की यह गली बहुत तंग है



रोशनी की यह गली बहुत तंग है ,
हम यहाँ से होकर जो जायेंगे -
अंधेरों में सन जायेंगे !
हमने अपनी तड़प से कई बार पूछा -
कि तू क्यों उन अंधेरी ,गुमनाम गलियों की ,
रोज़ जीती और मरती कथा कहती आ रही है,
क्यों मुझे चैन से जीने नहीं देती,
क्यों सता रही है ,
यह रोशनी,यह रौनक ,यह रंग -
तुझे क्यों नहीं भाता ,
क्यों तुझे भी राजपथ पर चलना नहीं आता,
मगर कोई जवाब नहीं आया -
सिवा इसके कि भीतर
कुछ तड़का, कुछ टूटा ,
कुछ धसक गया !!
कुछ आवाज़ों के शब्द नहीं ,सिर्फ अर्थ होते हैं !!

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

हासिल-ए-सौदा-ए-खाम








क्या जाने इस तड़प का कुछ होगा असर भी,
मझधार में ही डूब न जाये ये लहर भी !


साहिल से लग के बैठा हूँ क्या जानिए कब वो,
उस पार से आवाज़ दे 'अब आओ इधर भी '!


यूं ही नहीं मिला है इन्हें ताब-ए-नज्ज़ारा ,
देखी है इन आँखों ने क़यामत की सहर भी !


दिल से ही निकल आएंगे हर बात के मानी ,
कुछ देर को रक्खो ज़रा तुम दिल पे नज़र भी !


फिर हासिल-ए-सौदा-ए-खाम ये रहा 'मिसिर',
दिल भी गया,सर भी गया और अबके जिगर भी !

अब जो लाये हो तो ये चाँद












अब जो लाये हो तो ये चाँद -
कहाँ रक्खूँगी ?


भर चुका दिल का ये संदूक ,
गम-ए-फुरक़त से !


यूं भी छोटा - सा है ,
थोड़े में ही भर जाता है !


फिर जो लाते तो तब लाते इसे 
जब चाहा था !


तब ये छोटा-सा था 
संदूक में जगह भी थी !


अब जो लाये हो तो 
कितना बड़ा कर लाये हो !


चहरे की सलवटें ज़रा देखो !!
जैसे हर तह में कोई -हवस छुपा रक्खी हो ??



वैसे भी मांगे मिली चीज़ 
मरी होती है!


और मेरे गम अभी जिंदा हैं ,
जवाँ गुल की तरह !


फैलनें लग गयी है 
जिनकी महक बस्ती में ,


हाँ !! ये तुम तक भी गयी होगी 
तभी आये हो!


और दिखावे की लगावट -
का चाँद लाये हो !


जाओ ले जाओ -
अब कोई जगह खाली नहीं !


भर चूका दिल का ये संदूक -
गमें-फुरक़त से!!

बुधवार, 18 अगस्त 2010

सुबह का ख़्वाब

सुबह का ख़्वाब,
वो भी प्रीतम का,
तन और मन जैसे,
चिपक गए होँ कसके,
देखो कितनी,
लाल हो गई है सुबह,
खीँच कर छुड़ाने मेँ,
अब दिन भर,
खिँचे खिचे रहेँगे दोनोँ,
कहीँ अटके अटके,
पुरानी यादों  के,
कमरे मेँ,
मैले भारी परदोँ जैसे,
उदास हिलते रहेँगे,
लटके लटके।.

सोमवार, 26 जुलाई 2010

अंजाम-ए-आशिकी क्या है

वफ़ा में मेरी कसर कोई रह गयी क्या है ,
जब भी पूछा,तो वो बोला,तुम्हें जल्दी क्या है |

लूट कर मुझको वो कज्जाख अब ये कहता  है,
और हो जायेगा फिर, आपको कमी क्या है  |  

ये कत्लगाह, सलीबें, ये सलासिल, ये कफस,
अब न पूछूँगा मैं, अंजाम-ए-आशिकी क्या है |

नागहाँ चाँद ढल गया मगर फिर उसके बाद ,
देर तक छाई रही उसकी चांदनी क्या है |

न पूँछ हाल, ये है गर्क-ए-मुहब्बत, इसको-
खबर नहीं की ख़ुदी क्या है बेख़ुदी क्या है |

आँख से उसकी जो देखा तो ये जाना हमने,
इक तमाशे के सिवा और ज़िन्दगी  क्या है |

अश्क में डूबे हैं अशआर "मिसिर" के लेकिन,
दाद मिलने पे ये चेहरे की ताजगी क्या है  | 

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

बे-चेहरा ख़ाब

ये रात
ख़ुद भी नहीं सोती 
करवटें 
बदलती रहती है 
और एक 
बे-चेहरा ख़ाब 
बेचैन-ओ-परेशां 
भटकता रहता है 
करवट-दर-करवट 
ज़िंदगी के तिलस्मी 
आइनाघर में ,
ख़यालों की भीड़ में
गुम हो चुके उस 
चेहरे की खोज में 
जो कभी उसका था !
हरेक आइना 
उसे एक चेहरा 
दिखाता है 
जिसे देख वह कुछ 
ठिठकता है 
मगर फिर 
आगे बढ़ जाता है !
एक रात मैंने उसे 
रोक कर पूछा -
मुद्दतों हुए तुम्हें 
यूहीं भटकते ,
और ये आईने
तुम्हारे चेहरे की 
ठीक ठीक नक़ल भी 
अब तक न बना पाए ,
पुराने पड़ चुके उस
चेहरे को आखिर तुम 
कैसे पहचानोगे ,
अब तक तो 
टूट फूट घिस कर 
कितना कुछ 
बदल चुका होगा वह !
वह बोला -
मेरे चेहरे की पेशानी पर 
मुसीबतों के बोसे का 
स्याह निशान है 
वह न बदला होगा 
उसी से पहचानूँगा 
आम आदमी की
ज़िंदगी के ख़ाब का
चेहरा जो ठहरा !!

गुरुवार, 24 जून 2010

समझना और अब क्या





समझना और अब क्या कोई समझी बात क्या समझे,
हम उनको देखो क्या समझे थे और वो हमको क्या समझे !


तेरी सीटी पे आखिर अब वो खिड़की क्यों नहीं खुलती,
बड़े नादां 'मिसिर' हो तुम तगाफुल को हया समझे !



मेरी भोली सी सूरत उसने क्या से क्या बना डाली ,
गज़ब हमने किया जो नुक्ताचीं को आइना समझे !



उन्हें खुद के संवरने से नहीं फुर्सत मिली अब तक ,
क्या देखें ग़ज़ल मेरी क्या वो अंदाज़े-बयां समझे !



न बरसे अब्र अब तक ज़िंदगी की शाम हो आयी ,
हम इन सूखी घटाओं को हवाओं की जफा समझे !

शनिवार, 5 जून 2010

जीवित प्रार्थना बनकर



पर्वत शिखरोँ पर जमीँ
प्रस्तरीभूत हिम-सा मैँ
तुमसे अभिभूत -
ओ ! सौन्दर्य सिन्धु,
अपनी प्रार्थनाओँ के
ताप से पिघल कर
आकर्षण की ढलानोँ पर
बहा हूँ
दौड़ता, कभी -
ठिठकता ठहरता,
स्वयं मेँ चक्कर खाता,
और पुनः वेग पाकर
बह निकलता,
नुकीले आलोचक
पत्थरोँ को गोल करता,
तट के वृक्षोँ को सीँचता,
जल- जन्तुओँ को
आश्रय देता,
तुम्हारी ओर एक जीवित
प्रार्थना बनकर बहा हूँ।
इन प्रार्थनाओँ को
सूखने मत देना,कि-
मैँ तुम्हारी सतह पर
आनन्द-नर्तन करती
एक हिलोर -सा
तेरा ही खेल खेल सकूँ
तुझसे ही
तुझमेँ ही...
......

शनिवार, 15 मई 2010

ख़ौफ मेँ मत जी 'मिसिर'

दास्ताँ तो एक ही है
फर्क है उन्वान मेँ,
बस मुहब्बत ही लिखा
गीता मेँ और कुरआन मेँ।

हाँ, सियासी तर्जुमानोँ
मेँ फर्क़ मिल जाएगा,
फर्क़ वरना कुछ नहीँ
इंसान और इंसान मेँ।

एक ही मक़सद तुम्हारा
माल कैसे लूट लेँ,
जाके तो देखो किसी
मंदिर मेँ या दूकान मेँ।

बड़ी मछली का निवाला
छोटी मछली है मगर,
फर्क़ क्या कुछ भी नहीँ
है जानवर इंसान मेँ।

गैर की बंदूक की गोली
न बन ऐ हमवतन,
घर का आंगन मत बदल
तू जंग के मैदान मेँ।

पुराने टूटे हुए फानूस
से बाहर निकल,
ख़ौफ मेँ मत जी 'मिसिर'
रख दे दिया तूफान मेँ।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

'मिसिर' अगर मर जाए तो


देर से आए आए तो,
नासेह जी शरमाए तो।

देख मुझे रोए न मगर,
मुँह से निकली हाए तो।

मुब्हम मुब्हम कुछ बोले,
राज न दे, भरमाए तो।

अबके होश सम्हालेँगे,
घूँघट वो सरकाए तो।

ख़ुद को मसीही आ जाए,
मर्ज़ अगर बढ़ जाए तो।

बोलो किसे सताओगे,
'मिसिर' अगर मर जाए तो।

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

तुम्हारे ही रंगोँ ने


तुम्हारी विशेषताएँ ही
तुम्हारी सीमाएँ
बन गई हैँ।


तुम्हारे ही रंगोँ ने
घेर रखा है
तुम्हारा आकाश,


और तुम्हारी गोल-गोल
चक्करदार उड़ानोँ ने
तुम्हारे
पर कतर दिए हैँ।


जबकि तुम
ओ,ज़िन्दगी!
बहती ही इसलिए हो
कि तुम
किनारोँ के बीच
रहना नहीँ चाहती।


जब जब किनारोँ ने
तुम्हेँ दबाया है
तुमने अपना वजूद
उनसे टकराया है


अक्सर ही तुमने उन्हेँ
अपनी आलोचनाओँ से
काटा है कुतरा है,
अपनी सहायक नदियोँ  का
 समर्थन-जल पाकर
जब जब तुम बढ़ी हो
तुमने उन्हेँ तोड़ा है
या जब तुम
क्षीण हुई हो
उनसे मुँह मोड़ा है
उन्हेँ छोड़ा है,
क्योँकि तुमने
स्वयं को सदा
 एक असीम से जोड़ा है,
जहाँ कोई
किनारा नही
और जो तुम्हेँ
विशिष्ट नहीँ रहने देता
साधारण कर देता है
स्वयं तुम्हारा
आवरण बनकर
तुम्हेँ निरावरण
कर देता है
ताकि तुम दे सको
अपना सर्वस्व
और मुक्त हो सको
निजता के भार से।

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

'मिसिर' शहर मेँ तेरे



न किसी का है न मेरा
न ज़माना तेरा,
फिर दिले-ख़स्ता कहाँ
होगा ठिकाना तेरा।

बर्क़वश आए निगाहोँ मेँ
चमक छोड़ गए,
ऐसे आने से तो बेहतर था
न आना तेरा।

कर लिया चाक गरेबान
ख़ाक मुँह पे मली,
कितना सजधज के चला
आज दिवाना तेरा।

शर्त है अहदे-वस्ल मैँ
ही ना रहूँ मौजूद,
क्या नहीँ है ये न मिलने
का बहाना तेरा।

'मिसिर' शहर मेँ तेरे
बुलबुलेँ भी क्या करतीँ,
अब तो सुनता ही नहीँ
कोई तराना तेरा।

मंगलवार, 23 मार्च 2010

जब हया ही तेरी


जब हया ही तेरी
फ़ितरत ठहरी,
नक़्शबंदी तो
मुसीबत ठहरी।

तू हमेशा नयी
दिखती है मगर,
ये पुरानी तेरी
आदत ठहरी।

बाम पर तुझको
नहीँ आना था,
फिर बुलाना तो
शरारत ठहरी।

वस्ल मेँ होश मगर
किसको था,
हिज़्र ठहरा तो
मुहब्बत ठहरी।

इक ख़ला तक तो
आ गए हो 'मिसिर',
इसके आगे तेरी
किस्मत ठहरी।

बुधवार, 17 मार्च 2010

बेचूनोचरा

कुछ नहीँ छोड़ा बीनाई मेँ,
ले लिया सब मुँह दिखाई मेँ।

सुर्ख़रू होकर ढला सूरज,
शब की काली रोशनाई मेँ।

कासा-ए-माज़ी गिरा सर से,
जीस्त पँहुची नारसाई मेँ।

'मिसिर' बाकी दिन कटेँगे क्या,
चौखटोँ की शनासाई मेँ?

होके अब बेज़ार बेचूनोचरा,
खुश रहो बेदस्तोपाई मेँ। 


 बीनाई= दृष्टी, कासा-ए-माज़ी= अतीत का घाट , जीस्त= अस्तित्व , नारसाई= पहुँच  के  परे , शनासाई= परिचय , बेचूनोचरा=मौन और  बिला शिकायत, बेदस्तोपाई= आश्रयहीनता

मंगलवार, 16 मार्च 2010

सहरे-सिद्करू



हो सका मुझसे न जो
आके उसे तू करदे,
सुब्हे-काजिब को मिटा
सहरे-सिद्करू करदे।

क़ैदे-कोहसार मेँ कबसे
रुका पड़ा हूँ मैँ,
खोल कर राह मेरी
मुझको आबजू करदे।

ख़ुद से कुछ हटके चलूँ
ख़ुद ही का निगराँ बनकर,
कोई दिन के लिए मेरी
अना को 'तू' करदे।

रूहे-गुल की 'मिसिर'
कीमत नहीँ ज़माने मेँ,
ऐसा कर अबसे मुझे
उसकी रंगो-बू करदे।

अब तो ये दर्द ही पहचान
बन गया है मेरी,
मुझको डर है न मेरा
जख़्म तू रफ़ू करदे।