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गुरुवार, 24 जून 2010

समझना और अब क्या





समझना और अब क्या कोई समझी बात क्या समझे,
हम उनको देखो क्या समझे थे और वो हमको क्या समझे !


तेरी सीटी पे आखिर अब वो खिड़की क्यों नहीं खुलती,
बड़े नादां 'मिसिर' हो तुम तगाफुल को हया समझे !



मेरी भोली सी सूरत उसने क्या से क्या बना डाली ,
गज़ब हमने किया जो नुक्ताचीं को आइना समझे !



उन्हें खुद के संवरने से नहीं फुर्सत मिली अब तक ,
क्या देखें ग़ज़ल मेरी क्या वो अंदाज़े-बयां समझे !



न बरसे अब्र अब तक ज़िंदगी की शाम हो आयी ,
हम इन सूखी घटाओं को हवाओं की जफा समझे !

3 टिप्‍पणियां:

  1. समझना और अब क्या कोई समझी बात क्या समझे,

    हम उनको देखो क्या समझे थे और वो हमको क्या समझे !

    mazaa aa gaya

    उत्तर देंहटाएं
  2. तेरी सीटी पे आखिर अब वो खिड़की क्यों नहीं खुलती,
    बड़े नादां 'मिसिर' हो तुम तगाफुल को हया समझे !

    वाह.....वाह....क्या बात है इस नादानी की ......

    मेरी भोली सी सूरत उसने क्या से क्या बना डाली ,
    गज़ब हमने किया जो नुक्ताचीं को आइना समझे !

    सुभानालाह .....!!

    आज तो गज़ब ही ढा दिया मिसिर जी .....!!

    लाजवाब .....!!

    उत्तर देंहटाएं

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