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शनिवार, 5 जून 2010

जीवित प्रार्थना बनकर



पर्वत शिखरोँ पर जमीँ
प्रस्तरीभूत हिम-सा मैँ
तुमसे अभिभूत -
ओ ! सौन्दर्य सिन्धु,
अपनी प्रार्थनाओँ के
ताप से पिघल कर
आकर्षण की ढलानोँ पर
बहा हूँ
दौड़ता, कभी -
ठिठकता ठहरता,
स्वयं मेँ चक्कर खाता,
और पुनः वेग पाकर
बह निकलता,
नुकीले आलोचक
पत्थरोँ को गोल करता,
तट के वृक्षोँ को सीँचता,
जल- जन्तुओँ को
आश्रय देता,
तुम्हारी ओर एक जीवित
प्रार्थना बनकर बहा हूँ।
इन प्रार्थनाओँ को
सूखने मत देना,कि-
मैँ तुम्हारी सतह पर
आनन्द-नर्तन करती
एक हिलोर -सा
तेरा ही खेल खेल सकूँ
तुझसे ही
तुझमेँ ही...
......

4 टिप्‍पणियां:

  1. अभिव्यक्ति की महानतम उँचाइयोँ से उतर कर यह रचना स्वयँ मे एक जीवित प्रार्थना ही बन गई हैँ. रचना का शिल्प मन को छू लेने वाला है , उर्वर शब्द चयन तथा भाव प्रखरता के लिये ह्रदय से साथुवाद .

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  2. इन प्रार्थनाओँ को
    सूखने मत देना,कि-
    मैँ तुम्हारी सतह पर
    आनन्द-नर्तन करती
    एक हिलोर -सा
    तेरा ही खेल खेल सकूँ
    तुझसे ही
    तुझमेँ ही...

    बहुत सुंदर .....!!

    उत्तर देंहटाएं

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