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बुधवार, 17 मार्च 2010

बेचूनोचरा

कुछ नहीँ छोड़ा बीनाई मेँ,
ले लिया सब मुँह दिखाई मेँ।

सुर्ख़रू होकर ढला सूरज,
शब की काली रोशनाई मेँ।

कासा-ए-माज़ी गिरा सर से,
जीस्त पँहुची नारसाई मेँ।

'मिसिर' बाकी दिन कटेँगे क्या,
चौखटोँ की शनासाई मेँ?

होके अब बेज़ार बेचूनोचरा,
खुश रहो बेदस्तोपाई मेँ। 


 बीनाई= दृष्टी, कासा-ए-माज़ी= अतीत का घाट , जीस्त= अस्तित्व , नारसाई= पहुँच  के  परे , शनासाई= परिचय , बेचूनोचरा=मौन और  बिला शिकायत, बेदस्तोपाई= आश्रयहीनता

1 टिप्पणी:

  1. loving Arun it seems its a thoughtless thought.
    unfortunately i don't know even a single word of urdu how ever i dissolved your words in the bottom of my heart through given hints.
    what could i say more.................
    कुछ नहीँ छोड़ा बीनाई मेँ,
    ले लिया सब मुँह दिखाई मेँ।

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