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बुधवार, 6 अप्रैल 2011

वर्ष बीता






वर्ष बीता ,
आयु का घट
और कुछ रीता ,
अनूदित हो गया कुछ जल
सरल,निश्छल औ' तरल
शुभकामनाओं में !

सजल,श्यामल मेघ-खण्डों ने 
ललक ले ली सुलगती रेत,
नदी जिसको छोड़ पीछे 
बह गई थी सुखों की अनजान ढालों पर !

उमड़ कर छलक आया है 
किन्हीं गहराइयों में मौन बैठा जल !!

कौंधता रह-रह 
नदी का स्वप्न आँखों में 
पहाड़ों की हठीली ,कठिन ढालों पर !!

क्या नदी, तुम फिर उतर कर आओगी ,
लहरती,किल्लोलती , सिहरन जगाती ,

फिर बहोगी 
वक्ष के इस शुष्क मरुथल में ?

3 टिप्‍पणियां:

  1. कौंधता रह-रह
    नदी का स्वप्न आँखों में
    पहाड़ों की हठीली ,कठिन ढालों पर !!

    क्या नदी, तुम फिर उतर कर आओगी ,
    लहरती,किल्लोलती , सिहरन जगाती ,
    फिर बहोगी
    वक्ष के इस शुष्क मरुथल में ?

    sunder rachna , man me kai sawalo ko janm de gayi
    prabhavshaali rachna ke liye bahut bahut badhai

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या नदी, तुम फिर उतर कर आओगी ,
    लहरती,किल्लोलती , सिहरन जगाती ,

    फिर बहोगी
    वक्ष के इस शुष्क मरुथल में ?

    Adbhut kintu satya !!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. अंतिम पंक्तियां लाजवाब हैं....
    बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं

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