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शनिवार, 26 मई 2012

सहमा हुआ कलाबोध



अपनी गंध के धक्के से खिलता है फूल ,
जल की प्रचुरता ही देती है 
नदी को विस्तार ,
और असह्य पीड़ा से मिलती है
घाव को गहराई !

सहनीय पीड़ा भी
एक असहनीय पीड़ादायक स्थिति है  ,
घाव का उथला होना  उससे बड़ा  घाव है !

मैं हर उस चाकू की ओर दौड़ जाता हूँ 
जिसके  हत्थे  पर दिल खुदा होता है 
इस उम्मीद में कि अब घाव को
मिल सकेगी समुचित गहराई ,
पीड़ा को असहनीयता ,
और तेज़ हो सकेगी भट्ठी की आँच ,
खौलते पानी से उठेगी भाप
बादल बन कर कुछ समय को ही सही 
ढँक लेगी चाँद ,
इस चाँदनी से अच्छा है वह अंधेरा 
जिसकी बंद पलकों में 
छलछला आए लहू की एक बूंद 
ढरक  कर सूरज बन जाती है !

लेकिन मैं इन चाकुओं का क्या करूँ 
कला के नाम पर जिनकी धार 
छिपा दी गई है हत्थे में ही कहीं
शायद उस पर खुदे दिल में 
जिनमें लहू की जगह डर भरा है !

किसी काम  का नहीं इनका 
सहमा हुआ कलाबोध 
शीशे के पीछे रखी
सजावटी वस्तुएँ हैं ये !

ओह !! अपने डर को 
एक सौंदर्य-प्रसाधन  बना लेना 
कितना डरावना है !!

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब.....बहुत पसंद आया ...सही और सच है आपके हर लफ्ज में ..

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  2. waah!


    dard ki hadd se gujarna to abhi baaki hai
    toot kar mera bikharna to abhi baaki hai....


    ghaav ka gehra na hona ghaav ki avhelna hai...

    kya gehra khayaal hai....

    jeevan ka ek rahsya kholati kavita ki rachna par badhaai...


    -ckh-

    उत्तर देंहटाएं

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