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रविवार, 28 फ़रवरी 2010

धूप आ , धूप आ

धूप आ
धूप आ
बादल से कूद आ
पर्वत फलाँग आ
कोहरे को टाँग आ
नदी ताल पार कर
फुँनगियोँ पे मत ठहर
घने पेड़ छोड़ आ
घास घास दौड़ आ

मुझे फिर रंग दे
नया एक ढंग दे

डाल मुझे झुक कर
धूल से उठा ले
मेरा मुँह पोँछ दे
गोद मेँ बिठा ले
ममता के रूप आ
धूप आ
धूप आ