सोमवार, 25 जुलाई 2011
बुधवार, 22 जून 2011
तेरी मेहरबानी हो गई .........
हैफ ! हकगोई शहर की सरगिरानी हो गई ,
मिट गया वो जिस पे तेरी मेहरबानी हो गई !
मर गया वह भूख से कल रात के ढाई बजे ,
चाय-चर्चा के लिए ताज़ी कहानी हो गई !
उसने बच्चों को पिलाकर ज़हर खुद भी पी लिया ,
खुद की दुश्मन एक बेवा की जवानी हो गई !
उसकी अस्मत लुट गई लेकिन खुदा का शुक्र है ,
उसी कोठी में 'मिसिर' वह नौकरानी हो गई !
चार आँखों का जो दावा कर रही थी पार्टी ,
बन गई सरकार जब उसकी तो कानी हो गई !
गुरुवार, 19 मई 2011
जिन्हें शब्द नहीं मिले
.
मैं शहर की गलियों में
दिन-रात भटकता रहता हूँ ..............
उन अर्थों की तरह
जिन्हें शब्द नहीं मिले
और अगर मिले तो
भाषा से निर्वासित कर दिए गए
अशांति की आशंका में !
हर घटना के
अदि,मध्य और अंत को टटोलते हुए
उन निर्वासित शब्दों की टोह में
भटकता रहता हूँ
इस सच के साथ
कि जिस दिन हम
भाषा में घटित होंगे ,
कई जगहों से टूटी हुई भाषा पूरी होकर
हमारे पक्ष में खड़ी हो जायेगी,
बेदखल कर दी जायेंगी
गलत व्याख्याएँ और परिभाषायें
और तब इस दुनियाँ को भी बदलना होगा !
मैं शहर की गलियों में
दिन-रात भटकता रहता हूँ ..............
उन अर्थों की तरह
जिन्हें शब्द नहीं मिले
और अगर मिले तो
भाषा से निर्वासित कर दिए गए
अशांति की आशंका में !
हर घटना के
अदि,मध्य और अंत को टटोलते हुए
उन निर्वासित शब्दों की टोह में
भटकता रहता हूँ
इस सच के साथ
कि जिस दिन हम
भाषा में घटित होंगे ,
कई जगहों से टूटी हुई भाषा पूरी होकर
हमारे पक्ष में खड़ी हो जायेगी,
बेदखल कर दी जायेंगी
गलत व्याख्याएँ और परिभाषायें
और तब इस दुनियाँ को भी बदलना होगा !
नए सबेरे का सूरज
.
वो जिनके सीनों में दुबक कर
रौशनी ने खुद को बचा रक्खा है
अंधेरों की निगाहों से ,
तुम्हारे भुलावे के जंगल से
निकल कर पंहुच रहे हैं
सोंच के इक अंजाम तक !
जल्द यह घाटी भर जायेगी
जुगनुओं से
और यहीं से उगेगा
नए सबेरे का सूरज !
और आंधी सिर्फ हवाओं की ही नहीं होती
जिसमें सिर्फ शाखें ही टूटती हैं ,
दरख़्त ही उखड़ते हैं-
आंधी रौशनी की भी होती है
जिसमें जड़ें तक जल जाती हैं !
रौशनी ने खुद को बचा रक्खा है
अंधेरों की निगाहों से ,
तुम्हारे भुलावे के जंगल से
निकल कर पंहुच रहे हैं
सोंच के इक अंजाम तक !
जल्द यह घाटी भर जायेगी
जुगनुओं से
और यहीं से उगेगा
नए सबेरे का सूरज !
और आंधी सिर्फ हवाओं की ही नहीं होती
जिसमें सिर्फ शाखें ही टूटती हैं ,
दरख़्त ही उखड़ते हैं-
आंधी रौशनी की भी होती है
जिसमें जड़ें तक जल जाती हैं !
बुधवार, 6 अप्रैल 2011
वर्ष बीता
वर्ष बीता ,
आयु का घट
और कुछ रीता ,
अनूदित हो गया कुछ जल
सरल,निश्छल औ' तरल
शुभकामनाओं में !
सजल,श्यामल मेघ-खण्डों ने
ललक ले ली सुलगती रेत,
नदी जिसको छोड़ पीछे
बह गई थी सुखों की अनजान ढालों पर !
उमड़ कर छलक आया है
किन्हीं गहराइयों में मौन बैठा जल !!
कौंधता रह-रह
नदी का स्वप्न आँखों में
पहाड़ों की हठीली ,कठिन ढालों पर !!
क्या नदी, तुम फिर उतर कर आओगी ,
लहरती,किल्लोलती , सिहरन जगाती ,
फिर बहोगी
वक्ष के इस शुष्क मरुथल में ?
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
यही जोड़-तोड़
छोटे छोटे धागों के टुकड़े ,
उलझ भी जाएँ तो -
एक एक खींच लो या
जमीन पर पटक दो,
खुल के बिखर जायेंगे !
लम्बे लम्बे धागे यदि
आपस में उलझ जाएँ -
सुलझाना मुश्किल है !
उलझे इस ज़माने की
लम्बी-लम्बी बातें भी
बहुत बहुत उलझी हैं,
जितना भी सुलझाओ
और उलझ जातीं हैं !
थक-हार हम
इस उलझन से झुंझलाकर,
तोड़ तोड़ धागों को
अलग कर डालते हैं ,
और यह समझते हैं-
विश्लेषण कर लिया ,
बात सब समझ ली !
लेकिन इस बीच
यह जाते हैं भूल कि -
कौन- सा टुकड़ा किस धागे से तोड़ा था
कौन- सी बात किस बात का हिस्सा है !
अब नयी उलझन कि -
किन- किन हिस्सों को आपस में जोड़ दें ,
कहीं फिर झुंझलाकर और भी न तोड़ दें ,
या कि इन्हें घबराकर ऊबें और छोड़ दें !
लेकिन हमने धीरज से काम लिया-
कौन जान पायेगा ?
किसी को किसी में जैसे-तैसे जोड़ दिया,
रील एक बना ली ,
अब मैं बुद्धिमान, प्रतिभा का धनीहूँ,
ए! ज़रा सुनों तनिक,
दुनियाँ को समझोगे ?
देखो, मैं दार्शनिक !
मेरे जैसे जाने कितने
और भी हैं रील वाले,
रोशन चराग हैं रुपहली कंदील वाले ,
उनके अपने फंडे हैं ,
उनके अपने झण्डे हैं ,
विरोधियों के वास्ते-
छुपे आस्तीनों में
मूठ लगे डंडे हैं ,
आपस में जिनके
लगी बड़ी होड़ है ,
और मैं ये सोंचता हूँ ,
ज़िंदगी !!
क्या तेरा नाम बस
है यही जोड़-तोड़ ?
उलझ भी जाएँ तो -
एक एक खींच लो या
जमीन पर पटक दो,
खुल के बिखर जायेंगे !
लम्बे लम्बे धागे यदि
आपस में उलझ जाएँ -
सुलझाना मुश्किल है !
उलझे इस ज़माने की
लम्बी-लम्बी बातें भी
बहुत बहुत उलझी हैं,
जितना भी सुलझाओ
और उलझ जातीं हैं !
थक-हार हम
इस उलझन से झुंझलाकर,
तोड़ तोड़ धागों को
अलग कर डालते हैं ,
और यह समझते हैं-
विश्लेषण कर लिया ,
बात सब समझ ली !
लेकिन इस बीच
यह जाते हैं भूल कि -
कौन- सा टुकड़ा किस धागे से तोड़ा था
कौन- सी बात किस बात का हिस्सा है !
अब नयी उलझन कि -
किन- किन हिस्सों को आपस में जोड़ दें ,
कहीं फिर झुंझलाकर और भी न तोड़ दें ,
या कि इन्हें घबराकर ऊबें और छोड़ दें !
लेकिन हमने धीरज से काम लिया-
कौन जान पायेगा ?
किसी को किसी में जैसे-तैसे जोड़ दिया,
रील एक बना ली ,
अब मैं बुद्धिमान, प्रतिभा का धनीहूँ,
ए! ज़रा सुनों तनिक,
दुनियाँ को समझोगे ?
देखो, मैं दार्शनिक !
मेरे जैसे जाने कितने
और भी हैं रील वाले,
रोशन चराग हैं रुपहली कंदील वाले ,
उनके अपने फंडे हैं ,
उनके अपने झण्डे हैं ,
विरोधियों के वास्ते-
छुपे आस्तीनों में
मूठ लगे डंडे हैं ,
आपस में जिनके
लगी बड़ी होड़ है ,
और मैं ये सोंचता हूँ ,
ज़िंदगी !!
क्या तेरा नाम बस
है यही जोड़-तोड़ ?
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

