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सोमवार, 21 जनवरी 2013

मैं पुरुष


मैं पुरुष हूँ 
और यह मेरा चुनाव नहीं ,
मुझे इसका कोई पछतावा नहीं 
और न ही कोई शर्मिंदगी 
मैंने तो नहीं दिखाई कभी 
किसी स्त्री के प्रति दरिंदगी 
न ही अपने बाहुबल से रौंदा 
उसकी कोमलता को 
बल्कि उसे संभाला है, 
सहेजा  है ,संवारा है ,
प्रेम किया है उसे !
हाँ ,मैं पुरुष हूँ 
देह से और  मानसिकता से 
पुरुष  होना स्त्री होने से  कम भव्य है क्या ? 
पौरुष को पशुता का पर्याय मत कहो 
पशुओं में नर  ही नहीं 
मादाएं भी होती हैं !

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