अब जो लाये हो तो ये चाँद -
कहाँ रक्खूँगी ?
भर चुका दिल का ये संदूक ,
गम-ए-फुरक़त से !
यूं भी छोटा - सा है ,
थोड़े में ही भर जाता है !
फिर जो लाते तो तब लाते इसे
जब चाहा था !
तब ये छोटा-सा था
संदूक में जगह भी थी !
अब जो लाये हो तो
कितना बड़ा कर लाये हो !
चहरे की सलवटें ज़रा देखो !!
जैसे हर तह में कोई -हवस छुपा रक्खी हो ??
वैसे भी मांगे मिली चीज़
मरी होती है!
और मेरे गम अभी जिंदा हैं ,
जवाँ गुल की तरह !
फैलनें लग गयी है
जिनकी महक बस्ती में ,
हाँ !! ये तुम तक भी गयी होगी
तभी आये हो!
और दिखावे की लगावट -
का चाँद लाये हो !
जाओ ले जाओ -
अब कोई जगह खाली नहीं !
भर चूका दिल का ये संदूक -
गमें-फुरक़त से!!



