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बुधवार, 6 अप्रैल 2011

वर्ष बीता






वर्ष बीता ,
आयु का घट
और कुछ रीता ,
अनूदित हो गया कुछ जल
सरल,निश्छल औ' तरल
शुभकामनाओं में !

सजल,श्यामल मेघ-खण्डों ने 
ललक ले ली सुलगती रेत,
नदी जिसको छोड़ पीछे 
बह गई थी सुखों की अनजान ढालों पर !

उमड़ कर छलक आया है 
किन्हीं गहराइयों में मौन बैठा जल !!

कौंधता रह-रह 
नदी का स्वप्न आँखों में 
पहाड़ों की हठीली ,कठिन ढालों पर !!

क्या नदी, तुम फिर उतर कर आओगी ,
लहरती,किल्लोलती , सिहरन जगाती ,

फिर बहोगी 
वक्ष के इस शुष्क मरुथल में ?

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

ज़रूरतें


हर दिन ज़रूरतें,  
मेरी गर्दन पर एक जुआ रख देती हैं !

हर दिन मैं एक कोल्हू खींचता हूँ 
और कोल्हू मुझे !

सारा दिन -
ऊब  के साथ एक ही वृत्त में घूमते रहना 
सरसों के साथ मेरा भी तेल निकाल लेता है !

और शाम 
एक खाली बोरी घर वापस लौटती है ,
जिसके मुंह का एक कोना अब भी खुला  है !

है न अजीब !

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

यही जोड़-तोड़






छोटे छोटे धागों के टुकड़े ,
उलझ भी जाएँ तो -
एक एक खींच लो या
जमीन पर पटक दो,
खुल के बिखर जायेंगे !

लम्बे लम्बे धागे यदि
आपस में उलझ जाएँ -
सुलझाना मुश्किल है !

उलझे इस ज़माने की
लम्बी-लम्बी बातें भी
बहुत बहुत उलझी हैं,
जितना भी सुलझाओ
और उलझ जातीं हैं !

थक-हार हम
इस उलझन से झुंझलाकर,
तोड़ तोड़ धागों को
अलग कर डालते हैं ,
और यह समझते हैं-
विश्लेषण कर लिया ,
बात सब समझ ली !

लेकिन इस बीच
यह जाते हैं भूल कि -
कौन- सा टुकड़ा किस धागे से तोड़ा था
कौन- सी बात किस बात का हिस्सा है !

अब नयी उलझन कि -
किन- किन हिस्सों को आपस में जोड़ दें ,
कहीं फिर झुंझलाकर और भी न तोड़ दें ,
या कि इन्हें घबराकर ऊबें और छोड़ दें !

लेकिन हमने धीरज से काम लिया-
कौन जान पायेगा ?
किसी को किसी में जैसे-तैसे जोड़ दिया,
रील एक बना ली ,
अब मैं बुद्धिमान, प्रतिभा का धनीहूँ,
ए! ज़रा सुनों तनिक,
दुनियाँ को समझोगे ?
देखो, मैं दार्शनिक !

मेरे जैसे जाने कितने
और भी हैं रील वाले,
रोशन चराग हैं रुपहली कंदील वाले ,
उनके अपने फंडे हैं ,
उनके अपने झण्डे हैं ,
विरोधियों के वास्ते-
छुपे आस्तीनों में
मूठ लगे डंडे हैं ,
आपस में जिनके
लगी बड़ी होड़ है ,
और मैं ये सोंचता हूँ ,
ज़िंदगी !!
क्या तेरा नाम बस
है यही जोड़-तोड़
 ?

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

रोशनी की यह गली बहुत तंग है



रोशनी की यह गली बहुत तंग है ,
हम यहाँ से होकर जो जायेंगे -
अंधेरों में सन जायेंगे !
हमने अपनी तड़प से कई बार पूछा -
कि तू क्यों उन अंधेरी ,गुमनाम गलियों की ,
रोज़ जीती और मरती कथा कहती आ रही है,
क्यों मुझे चैन से जीने नहीं देती,
क्यों सता रही है ,
यह रोशनी,यह रौनक ,यह रंग -
तुझे क्यों नहीं भाता ,
क्यों तुझे भी राजपथ पर चलना नहीं आता,
मगर कोई जवाब नहीं आया -
सिवा इसके कि भीतर
कुछ तड़का, कुछ टूटा ,
कुछ धसक गया !!
कुछ आवाज़ों के शब्द नहीं ,सिर्फ अर्थ होते हैं !!

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

हासिल-ए-सौदा-ए-खाम








क्या जाने इस तड़प का कुछ होगा असर भी,
मझधार में ही डूब न जाये ये लहर भी !


साहिल से लग के बैठा हूँ क्या जानिए कब वो,
उस पार से आवाज़ दे 'अब आओ इधर भी '!


यूं ही नहीं मिला है इन्हें ताब-ए-नज्ज़ारा ,
देखी है इन आँखों ने क़यामत की सहर भी !


दिल से ही निकल आएंगे हर बात के मानी ,
कुछ देर को रक्खो ज़रा तुम दिल पे नज़र भी !


फिर हासिल-ए-सौदा-ए-खाम ये रहा 'मिसिर',
दिल भी गया,सर भी गया और अबके जिगर भी !

अब जो लाये हो तो ये चाँद












अब जो लाये हो तो ये चाँद -
कहाँ रक्खूँगी ?


भर चुका दिल का ये संदूक ,
गम-ए-फुरक़त से !


यूं भी छोटा - सा है ,
थोड़े में ही भर जाता है !


फिर जो लाते तो तब लाते इसे 
जब चाहा था !


तब ये छोटा-सा था 
संदूक में जगह भी थी !


अब जो लाये हो तो 
कितना बड़ा कर लाये हो !


चहरे की सलवटें ज़रा देखो !!
जैसे हर तह में कोई -हवस छुपा रक्खी हो ??



वैसे भी मांगे मिली चीज़ 
मरी होती है!


और मेरे गम अभी जिंदा हैं ,
जवाँ गुल की तरह !


फैलनें लग गयी है 
जिनकी महक बस्ती में ,


हाँ !! ये तुम तक भी गयी होगी 
तभी आये हो!


और दिखावे की लगावट -
का चाँद लाये हो !


जाओ ले जाओ -
अब कोई जगह खाली नहीं !


भर चूका दिल का ये संदूक -
गमें-फुरक़त से!!

बुधवार, 18 अगस्त 2010

सुबह का ख़्वाब

सुबह का ख़्वाब,
वो भी प्रीतम का,
तन और मन जैसे,
चिपक गए होँ कसके,
देखो कितनी,
लाल हो गई है सुबह,
खीँच कर छुड़ाने मेँ,
अब दिन भर,
खिँचे खिचे रहेँगे दोनोँ,
कहीँ अटके अटके,
पुरानी यादों  के,
कमरे मेँ,
मैले भारी परदोँ जैसे,
उदास हिलते रहेँगे,
लटके लटके।.